भारत का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का नहीं, बल्कि ज्ञान और शिक्षा की उज्ज्वल परंपरा का इतिहास भी है। इस गौरवशाली परंपरा में तक्षशिला विश्वविद्यालय का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। यह न केवल भारत का बल्कि विश्व का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय माना जाता है, जहाँ से विद्या का प्रकाश पूरी दुनिया में फैला।
पौराणिक कथाओं के अनुसार तक्षशिला की स्थापना राजा तक्ष ने की थी, जो भरत (भगवान राम के भाई) के पुत्र थे। इसलिए इसका नाम पड़ा — “तक्ष की शिला”। यह नगर आज के पाकिस्तान के रावलपिंडी के पास स्थित है। पुरातत्व के अनुसार इसकी स्थापना लगभग 1000 ईसा पूर्व में हुई थी, यानी आज से लगभग 3000 वर्ष पहले।
तक्षशिला उस समय का एक महान शिक्षा और अनुसंधान केंद्र था। यहाँ भारत सहित चीन, यूनान, मिस्र और बाबिलोनिया जैसे देशों से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे। यहाँ धर्म, नीति, चिकित्सा, गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, सैन्य विज्ञान, कृषि और वास्तुशास्त्र तक की पढ़ाई होती थी।
तक्षशिला की विशेषता यह थी कि यहाँ शिक्षा केवल पुस्तकीय नहीं, बल्कि जीवन-आधारित और व्यावहारिक होती थी। विद्यार्थी गुरु के आश्रमों में रहकर अध्ययन करते थे। यही से चाणक्य (कौटिल्य) ने अपनी शिक्षा प्राप्त की थी, जिन्होंने आगे चलकर मौर्य साम्राज्य की नींव रखी। प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य पाणिनि, वैद्य चर्क, और आचार्य आत्रेय जैसे विद्वान भी तक्षशिला से जुड़े थे।
यहाँ किसी भी प्रकार की जाति या वर्गभेद नहीं था। शिक्षा सबके लिए समान रूप से उपलब्ध थी, जिससे यह स्थान सार्वभौमिक ज्ञान और विचारों का संगम बन गया था।
यद्यपि समय के प्रवाह और विदेशी आक्रमणों से तक्षशिला धीरे-धीरे नष्ट हो गया, लेकिन उसकी विद्या की ज्योति आज भी भारतीय संस्कृति के हृदय में जल रही है।
तक्षशिला विश्वविद्यालय हमें यह सिखाता है कि सच्ची शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि उसे समाज के कल्याण में लगाना है। यही कारण है कि तक्षशिला आज भी विश्व के लिए भारतीय शिक्षा दर्शन का प्रतीक बना हुआ है।
तक्षशिला का सबसे बड़ा रहस्य था — उसकी शिक्षा प्रणाली। यहाँ न कोई औपचारिक कक्षाएँ थीं, न ही परीक्षा का बोझ। विद्यार्थी गुरुओं के आश्रमों में रहकर व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करते थे। यहाँ धर्म, दर्शन, चिकित्सा, ज्योतिष, गणित, राजनीति, सैन्य कला, कृषि, और आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे।
एक और रहस्य यह था कि तक्षशिला में प्रवेश आसान नहीं था। केवल कुशाग्र बुद्धि और अनुशासनप्रिय विद्यार्थी ही यहाँ स्थान पा सकते थे। हर विषय के लिए अलग गुरु और आश्रम होते थे, और छात्र को उसी गुरु की अनुमति से आगे की शिक्षा मिलती थी।
तक्षशिला से जुड़ी सबसे बड़ी किंवदंती है — चाणक्य (कौटिल्य) की। उन्होंने यहीं शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। इसी विश्वविद्यालय से पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण को एक नई दिशा दी, और आत्रेय तथा चर्क ने चिकित्सा विज्ञान में अमर योगदान दिया।
पुरातत्वविदों के अनुसार तक्षशिला में विशाल ग्रंथालय, अध्ययन कक्ष, और पत्थरों पर उकेरे गए सूत्रों के अवशेष मिले हैं — जो यह दर्शाते हैं कि यहाँ ज्ञान की हर शाखा सुव्यवस्थित रूप में मौजूद थी।
“ज्ञान ही वह दीपक है जो सभ्यता को अंधकार से उजाले की ओर ले जाता है।”
तक्षशिला नष्ट हुई, पर उसकी शिक्षा और दर्शन आज भी भारत की आत्मा में जीवित हैं।
- अनिल मालवीय, संचालक, हाईटेक ग्रुप ऑफ इंस्टीटयूशंस भोपाल मप्र


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