सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समय का दर्पण होता है — और जब कोई फिल्म इतिहास की जटिल परतों को छूती है, तो वह समाज के विचार और संवाद दोनों को झकझोर देती है। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘द ताज स्टोरी’ इसी प्रकार की एक कोशिश है, जिसने भारतीय दर्शकों के बीच न केवल जिज्ञासा जगाई, बल्कि विचार और विवाद दोनों को जन्म दिया। प्रसिद्ध अभिनेता परेश रावल द्वारा अभिनीत यह फिल्म ताजमहल की उत्पत्ति, उसकी ऐतिहासिक व्याख्या और उससे जुड़ी मान्यताओं पर प्रश्न उठाती है। यह फिल्म मात्र एक कहानी नहीं है, बल्कि एक बहस है — उस बहस का सिनेमाई रूप, जो भारत की स्मारकीय विरासत और इतिहास की व्याख्या को लेकर वर्षों से चली आ रही है।
फिल्म की कहानी एक कोर्टरूम ड्रामा के रूप में बुनी गई है, जहाँ इतिहास, धर्म, संस्कृति और राजनीति के बीच संवाद चलता है। फिल्म में प्रस्तुत सवाल यह है कि क्या ताजमहल केवल एक प्रेम का प्रतीक है, या उसके पीछे कोई छिपा हुआ ऐतिहासिक सच भी है। इस प्रश्न को निर्देशक ने बेहद नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया है। शुरुआत में यह कहानी जिज्ञासा पैदा करती है और दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या सच में इतिहास को बार-बार उसी रूप में बताया गया है, जैसा सत्ता ने चाहा। यही वह बिंदु है जहाँ फिल्म दर्शकों को जोड़ लेती है। परेश रावल का अभिनय सशक्त और प्रभावशाली है। वह एक विद्वान व्यक्ति की भूमिका में हैं जो तथ्यों और प्रमाणों के माध्यम से इतिहास की नई व्याख्या प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। उनका संवाद-प्रवाह, चेहरे के भाव और आत्मविश्वास फिल्म की आत्मा बन जाते हैं।
हालाँकि, जहाँ यह फिल्म अपनी ताकत से खड़ी होती है, वहीं कुछ कमजोरियों से भी जूझती दिखाई देती है। फिल्म का निर्देशन और लेखन कई स्थानों पर भारीपन का एहसास कराता है। कहानी जिस तेज़ी से आरंभ होती है, वही गति बीच में जाकर खो देती है। संवादों में बहस की तीव्रता तो है, लेकिन नाटकीयता और सृजनात्मक गहराई कहीं-कहीं कम पड़ जाती है। फिल्म कई बार “बहस के मंच” जैसी लगती है, जहाँ दर्शक को विचार तो मिलते हैं, पर भावनात्मक जुड़ाव नहीं। इसके बावजूद, यह मानना होगा कि फिल्म का साहस सराहनीय है — क्योंकि उसने ऐसे विषय को छुआ, जिस पर खुलकर बात करना अक्सर विवाद का कारण बनता है।
‘द ताज स्टोरी’ का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया। सिनेमा तभी सार्थक होता है जब वह प्रश्न पैदा करे, उत्तर नहीं थोपे। फिल्म यही करती है। यह मान्यताओं के भीतर छिपे सत्य को खोजने का निमंत्रण देती है। लेकिन यह भी सत्य है कि इतिहास की प्रस्तुति केवल जिज्ञासा से नहीं, प्रमाणों से पूरी होती है। कई इतिहासकारों ने फिल्म के दावों को चुनौती दी है और कहा है कि प्रस्तुत तर्क पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाणों पर आधारित नहीं हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो फिल्म इतिहास की खोज से अधिक एक वैचारिक प्रयोग प्रतीत होती है। निर्देशक ने जो कहा, वह “संभावना” के रूप में दिलचस्प है, पर “सत्य” के रूप में कमज़ोर पड़ता है।
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो फिल्म का प्रभाव दोहरी दिशा में है। एक ओर यह दर्शकों में अपने इतिहास को समझने और प्रश्न करने की प्रवृत्ति जगाती है, वहीं दूसरी ओर संवेदनशील विषयों पर नए विवादों को भी जन्म देती है। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में इतिहास केवल अतीत का लेखा नहीं, बल्कि वर्तमान की भावनाओं से भी जुड़ा होता है। इसलिए जब कोई फिल्म ऐतिहासिक प्रतीकों — जैसे ताजमहल — पर वैकल्पिक दृष्टिकोण पेश करती है, तो स्वाभाविक रूप से समाज का एक हिस्सा असहज होता है। यही कारण है कि ‘द ताज स्टोरी’ रिलीज़ से पहले ही चर्चा और विवादों में आ गई थी। कुछ समूहों ने इसे इतिहास विकृति कहा, तो कुछ ने इसे ‘सत्य को खोजने का साहस’।
फिल्म का तकनीकी पक्ष औसत से बेहतर है। सिनेमेटोग्राफी में ताजमहल की भव्यता और रहस्य दोनों को दिखाया गया है। कैमरा मूवमेंट और लो-लाइट सीन में निर्देशक ने विषय की गंभीरता बनाए रखी है। संपादन थोड़ा खिंचा हुआ महसूस होता है, विशेषकर कोर्टरूम दृश्यों में जहाँ संवादों की पुनरावृत्ति फिल्म की गति को धीमा कर देती है। संगीत पृष्ठभूमि में गूंजता है, लेकिन यादगार नहीं बन पाता। फिर भी, जिस विषय को लेकर फिल्म बनी है, उसके अनुरूप इसका वातावरण गंभीर और चिंतनशील है।
फिल्म का सामाजिक संदेश यही है कि इतिहास को केवल पाठ्यपुस्तकों में बंद कर देना पर्याप्त नहीं; उसे प्रश्नों की रोशनी में देखा जाना चाहिए। परंतु प्रश्न उठाते समय वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवेदनशीलता दोनों आवश्यक हैं। यह फिल्म एक चेतावनी भी देती है कि अगर इतिहास को बिना पर्याप्त अध्ययन के प्रस्तुत किया जाए, तो वह संवाद की बजाय विभाजन पैदा कर सकता है। निर्देशक और कलाकारों का उद्देश्य भले ही सकारात्मक हो — जैसे कि परेश रावल ने स्वयं कहा कि “हमने किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ कुछ नहीं कहा” — लेकिन विषय की प्रकृति ऐसी है कि बहस अनिवार्य थी।
‘द ताज स्टोरी’ को देखने के बाद एक दर्शक के रूप में जो अनुभव होता है, वह यह कि यह फिल्म केवल ताजमहल की नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जो सवाल पूछने का साहस रखती है। यह फिल्म हमें यह याद दिलाती है कि भारत की आत्मा उसकी विविधता, विचार और संवाद में है। इतिहास को लेकर असहमति होना स्वाभाविक है, परंतु संवाद की संस्कृति बनाए रखना आवश्यक है। यही सिनेमा की शक्ति है — कि वह हमें सोचने, असहमत होने और फिर भी साथ रहने की कला सिखाता है।
संपादकीय दृष्टि से कहें तो ‘द ताज स्टोरी’ एक ऐसी फिल्म है जो तकनीकी पूर्णता से अधिक वैचारिक साहस पर आधारित है। यह फिल्म शायद सभी को पसंद न आए, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी आसान नहीं। इसने समाज में एक आवश्यक प्रश्न उठाया है — “क्या इतिहास वही है जो हमें बताया गया, या वह भी बदल सकता है?” यह प्रश्न ही इस फिल्म की असली उपलब्धि है। विवाद चाहे जितने हों, पर इसने सिनेमा को फिर से ‘विचार के मंच’ पर ला खड़ा किया है। ऐसे समय में जब मनोरंजन केंद्र में है और विचार हाशिये पर, ‘द ताज स्टोरी’ जैसी फिल्में हमें सोचने की दिशा देती हैं।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि ‘द ताज स्टोरी’ इतिहास और भावनाओं के बीच झूलती एक बहादुर कोशिश है। यह फिल्म न तो केवल सत्य है, न केवल कल्पना — बल्कि उस जिज्ञासा की यात्रा है, जो हर संवेदनशील समाज के लिए आवश्यक है। दर्शक के रूप में हमें इससे यह सीख लेनी चाहिए कि सवाल पूछना गलत नहीं, लेकिन उत्तर खोजने से पहले तथ्यों की नींव मजबूत होनी चाहिए। तभी सिनेमा सच में समाज का आईना बन सकता है।



